
पर्यावरण में गिद्धों की भूमिका:

पर्यावरण के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका है, सदियों से ये गिद्ध ही मरे हुए जानवरों के अवशेषों को खा कर देखा जाए तो धरती पर पडी गन्दगी को ख़त्म करते रहे हैं जिससे बहुत सी बिमारियाँ व संक्रमण की रोकथाम होती है। प्राकृतिक रूप से भोजन चक्र में गिद्धों की भूमिका अहम रही है और खाद्य श्रंखला में उनका महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन पिछले एक दशक में गिद्ध प्रजाति लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है।
मवेशियों के बीमार पड़ने पर पशु चिकित्सक अक्सर डाइक्लोफेनेक दवा के उपयोग की सलाह देते आए हैं। इस दवा से मवेशियों का ज्वर व दर्द दूर हो जाता है लेकिन इस दवाई को खाने के बाद यदि किसी पशु की मौत हो जाती है तो मरने पर गिद्धों का भोजन बने मवेशी, गिद्धों को भी मौत की नींद सुलाने लगे। भारत, पाकिस्तान और नेपाल में हुए सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के शरीर में डायक्लोफ़ेनाक के अवशेष मिले हैं। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इस दवा के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचता है, जिससे वे मौत का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से भारत में गिद्धों की संख्या तेजी से कम हो रही है। इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है कि पशुओं को दर्दनाशक के रुप मे एक दवा डायक्लोफ़ेनाक दी जाती है।
पर्यावरण को बचाए रखने में महत्वपूर्ण साबित हो रहे गिद्धों को भी बचाने के लिए पक्षी वैज्ञानिकों ने शोध किया। पता चला कि 1980 से बाजार में बिक रही डाइक्लोफेनेक दवा से मरे मवेशियों की वजह से गिद्धों में ‘बिसरल गौट’ बीमारी मिली। इस बीमारी से गिद्धों के गुर्दे खराब व काले पड़ने लगे थे, जिससे उनकी कुछ दिनों में मौत होने लगी।
रेगिस्तानी इलाकों के मुख्यतया पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या सिर्फ गुजरात में ही 2500 से घटकर 1400 रह गई है। कभी राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब बिरले ही कही दिखाई देते हों
प्रजनन:
इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। । भारत मे कभी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थी : बियर्डेड, इजिप्शयन, स्बैंडर बिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लोंगबिल्ड, हिमालियन ग्रिफिम एवं व्हाइट बैक्ड। इनमें से चार प्रवासी किस्म की हैं।
पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं का सर्वेक्षण रिपोर्ट क्या कहते हैं:
- सफ़ेद पूँछ वाले एशियाई गिद्धों की संख्या 1992 की तुलना में 99.9 प्रतिशत तक कम हो गई है।
- इसके अनुसार लंबे चोंच वाले और पतले चोंच वाले गिद्धों की संख्या में भी इसी अवधि में 97 प्रतिशत की कमी आई है।
- ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ लंदन के एंड्र्यू कनिंघम इस रिपोर्ट के सहलेखक भी हैं. वे कहते हैं, "इन दो प्रजातियों के गिद्ध तो 16 प्रतिशत, प्रतिवर्ष की दर से कम होते जा रहे हैं।"
- उनका कहना है, "यह तथ्य अपने आपमें डरावना और विचलित करने वाला है कि सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध हर साल 40 से 45 प्रतिशत की दर से कम होते जा रहे हैं।"
- शोधकर्ताओं ने सलाह दी थी कि जानवरों को डाइक्लोफ़ेनाक नाम की दर्दनाशक दवा को बंद कर देना चाहिए।
- भारत सरकार ने इसे वर्ष 2006 में प्रतिबंधित भी कर दिया गया था लेकिन भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रतिबंध का कोई ख़ास असर नहीं हुआ है। उनका कहना है कि जानवरों के लिए डाइक्लोफ़ेनाक दवा के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन अब लोग मनुष्यों के लिए बन रही दवा का उपयोग जानवरों के लिए कर रहे हैं। उनका कहना है कि दवा का आयात किया जा रहा है और इसका उपयोग हो रहा है।
- इससे पहले शोधकर्ताओं ने डाइक्लोफ़ेनाक की जगह मेलोक्सिकैम [Meloxicam] नाम की दवा के उपयोग की सलाह दी थी लेकिन चूँकि वह डाइक्लोफ़ेनाक की तुलना में दोगुनी महंगी है इसलिए इसका उपयोग नहीं हो रहा है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्धों के विलुप्त होने की रफ़्तार यही रही तो एक दिन ये सफ़ाई सहायक भी नहीं रहेंगे।
- जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक के शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्ध थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं।
- वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्धों को न केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना ज़रुरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी ज़रुरी है। वे चेतावनी देते रहे हैं कि गिद्ध नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई जानवरों तक मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफ़ाई करने वाला कोई नहीं होगा और इससे संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ेगा।
डायक्लोफेनिक दवा एक ज़हर, जो टनों की संख्या में गाँव-शहरो में उपलब्ध है
- संरक्षण के लिए उठाए गए कदम :
- पशुओं के इलाज के दौरान उन्हें दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लोफेनिक ही गिद्धों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, यह बात आज से करीब दो दशक पहले ही उजागर हो गई थी। डायक्लोफेनिक से गिद्धों की मौत होने की जानकारी करीब 18 साल पहले ही मिल गई थी, लेकिन तब से लेकर आज तक गिद्धों में दवा के असर को कम करने का कोई तरीका ढूंढ़ा नहीं जा सका है। भारत सरकार भी हाल ही में हुए सर्वेक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद मान गई कि इस दवाई के कारण ही गिद्धों की मौत हो रही है नतीजतन भारत सरकार से संबद्ध नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ़ ने डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी जिसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकार कर डायक्लोफ़ेनाक की जगह दूसरी दवाइयों के उपयोग को मंज़ूरी दे दी।

संरक्षण के लिए उठाए गए एक प्रायोगिक कदम :