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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

झारखण्ड का हाल : वन्य जीवों की हत्या कर सांस्कृतिक पह्चान बनती है

24 मार्च 2009 को बेड़ो (राँची) के सालो टोली जंगल में 21 पहड़ा पूर्वी (आदिवासी समुदाय) के तत्वाधान में आयोजित वार्षिक बासा शिकार के दौरान बतौर मुख्य अतिथि समाजसेवी सह शिक्षाविद डा0 रवींद्र भगत ने कहा,बासा शिकार हमारी परम्परा और सांस्कृतिक पहचान है

तत्पश्चात मुख्य अतिथि महोदय शिकार करने वाले दल का अगुआई कर शुभारम्भ भी किया। शिकारी दल का नेतृत्व 21 पहड़ा राजा गन्दरू उराँव, डा0 रवींद्र भगत (मुख्य अतिथि) और 21 गाँवों के पाहन, महतो, दीवान, कोटवार ने संयुक्त रूप से हरवे-हथियार से लैस होकर ग्रमीणों के साथ मिलकर मासु, हुलासी, शहेदा, लतरातु, कुल्ली, सौंका, डोला और सगुदा के जंगलों में शिकार खेला। सांस्कृतिक पहचान के रक्षक एवं परम्परा के वाहक तथाकथिक सभ्रांत लोगों ने शिकार की परम्परा को निभाने के लिए वन्यजीवों की हत्या की जबकि दूसरी ओर वन विभाग का भारी-भरकम महकमा इस तरह की घटनाओं को वन्यजीवों को अपने हाल पर छोड़ कर अँधी-बहरी बनी तमाशबीन बनी हुई है। विभाग द्वारा किसी तरह की कोई सार्थक पहल अभी तक नहीं हो रही है कि वन्य जीव आशांवित हों कि अगले दिन उनकी हत्या नहीं होगी।

मेरा पक्ष इस ओर है कि सांस्कृतिक पहचान एवं परम्परा का निर्वहन होना चहिए, इसी में हमारीभारतीय सांस्कृतिक की विश्व-पटल पर अमीट छाप भी है, लेकिन परम्परा के नाम पर रुढ़ीवादीव्यवस्था को ढ़ोना कहाँ तक जायज है, इसकी भी समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए।

बासा शिकार की आदिवासी समुदाय में परम्परा बहुत पुरानी रही होगी, वो भी उस जमाने में जब आदिवासी लोग के पास भौतिक सुख-सुविधाऐं नहीं थी, वे जंगलों में निवास करते होंगे एवं उनके पास जीने के साधन के रूप में एवं भोजन स्वरूप वन्यजीव सुलभ उपलब्ध रहें होंगे। इसी पृष्टभूमि में सांस्कृतिक व्यवस्था का जन्म हुआ होगा कि शिकार सामुहिक रूप से किया जाय जिससे समुदाय का संस्कृति का आदान-प्रदान हो एवं इसी बहाने लोगों में मेल-जोल भी बढ़ जाय, लेकिन ये व्यवस्था उस समय की थी जब वन्य जीवों की बहुतया थी। उसी व्यव्स्था (परम्परा) को आज के परिपेक्ष में ढ़ोना कहाँ तक जायज है ये कहीं से भी एक समाजसेवी एवं शिक्षाविद को शोभा नहीं देती क्योंकि उन्हें भी ये जानकारी होगी कि आज वन्य जीवों की क्या स्थिति है। आज अधिकांश वन्य जीवों की प्रजातियों पर संकट आ गयी हैं एवं विलुप्ति के कगार पर हैं, फिर ये किस तरह की पहचान बनाना चाहते हैं, जब उसके साधनों को उनके बच्चे हीं किताबों के पन्नों पर देखेंगे।

इस तरह की रूढ़ीवादी एवं जैव व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले अबोध लोगों की भर्तस्ना सामाजिक स्तर पर तथा उनके कुकृत्यों को रोकने की पहल भी की जानी चाहिए, ऐसी मेरी राय है।

3 पाठक टिप्पणी के लिए यहाँ क्लिक किया, आप करेंगे?:

Anil ने कहा…

खेदजनक।

Harkirat Haqeer ने कहा…

इस तरह की रूढ़ीवादी एवं जैव व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले अबोध लोगों की भर्तस्ना सामाजिक स्तर पर तथा उनके कुकृत्यों को रोकने की पहल भी की जानी चाहिए......!!

सही कहा आपने ...हम आपकी आवाज़ के साथ हैं...!!

रावेंद्रकुमार रवि ने कहा…

"बासा शिकार हमारी परंपरा और सांस्कृतिक पहचान है।" - भगतजी द्वारा अब जब भी यह बात कही जाए, तो इसमें यह और जोड़ा जाना चाहिए - "किंतु अब हम ऐसी घृणित परंपराओं को त्यागने की पहल कर रहे हैं!"

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