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बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

बन्द करो ये पुरस्कार : ट्रिपल खस्सी प्रतियोगिता!


राँची के नामकुम में आयोजित ट्रिपल खस्सी प्रतियोगिता ग्रीन गार्डन क्लब ने बेरियस बेक क्लब को 3-2 से हराकर जीत ली। इस प्रतियोगिता में 28 टीमें खेलीं। प्रतियोगिता का इतिहास 37 वर्षो का रहा है। ये एक फुटबॉल प्रतियोगिता है जिसका आयोजन शहर के नजदीक हुआ। ऐसी प्रतियोगिता देहाती एवं वन आच्छादित क्षेत्रो में देखने को मिलते थे। मेरी समझ से इस तरह के पुरस्कार उन दिनों की याद दिलाती है जब लोगो के पास मुद्रा की कमी रही होगी एवं पशुधन की उपलब्धता थी। तब गाँव के प्रधानों ने अपने खिलाड़ियों को प्रोत्तसाहित करने के लिए अपने घर के पालतु पशु को उपहार स्वरुप भेंट दिया होगा।
लेकिन आज के परिपेक्ष में जब आम लोग पहले से ज्यादा शिक्षित एवं आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत सबल हैं, तब इस तरह से पशुओं के प्रति व्यवहार एवं फुटबॉल प्रतियोगिता में डबल खस्सी प्रतियोगिता/ ट्रिपल खस्सी प्रतियोगिता का आयोजन कहाँ तक व्यवहारिक है। जिस प्रतियोगिता के आयोजन में हीं खून की बू आ रही हो, वह समाज एवं खेल को कौन मुकाम मिलेगा, ये समय बतलाऐगा। मैं सिर्फ यही कहूँगा कि इस खस्सी प्रतियोगिता से न तो फुटबॉल का विकास होगा और न तो खिलाड़ियो का। ये सिफ खाओ-पिओ मस्त रहो की उक्ति को चरितार्थ करता है। जबकि दूसरी तरफ समाज में पालतु पशुओं के प्रति घृणित व्यहार का समाजीकरण करने का अघोषित प्रयास मात्र है जिसे अबिलम्ब बंद करने की आवश्यता है। ऐसा नहीं कि मैं एक शाकाहारी व्यक्ति हूँ जिसके चलते उक्त कृत मुझे नहीं भाता, लेकिन ज़रा सोचिए क्या एक शिक्षित समाज को खेल प्रतियोगिता के माध्यम से उक्त कृत शोभा देता है। अगर पुरस्कार हीं देना है तो उसका स्वरूप तो पूरे विश्व की खेल प्रतियोगिताओं में रोज दिखता है, फिर ये पाषाणयुगी क्रियाकलाप क्यों? इस तरह के पुरस्कार से खेलों का विकास होने से रहा, दूसरी तरफ नवनिहालों के बाल मन पर भी खेल के प्रति क्या अवधारणा बनेगी, जरा इसका भी विवेचना कीजिए। चुँकि मैं लम्बे समय तक खिलाड़ी के रूप में विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग ले चुका हूँ, इसलिए मुझे आज ये पुरस्कार कहीं चुभ रहा है। पुरस्कार को अब तो सामाचर पत्र भी महिमामंडित करने लगे हैं एवं फोटो के साथ सामाचार का प्रकाशन करने लगे हैं ,जो अशुभ संकेत है इन निरीह पशुओं के प्रति।

रविवार, 3 मई 2009

4 मई को वन्यजीवों के जीवन से होली खेली जायेगी

जी, हाँ होली रंगो का त्योहार है तथा इसके आगमन पर असीम खुशियाँ भी साथ आती है, लेकिन कल जो होली खेली जायेगी वो खून की होली होगी, जिसमें वन्य जीवों का खून साधन होगा जबकि साधक जानवरों में विकसित दिमाग के धनी मानव समाज होगा।
मैं आपको ज्यादा देर अँधेरे में रखना नहीं चाहता। मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि कल 04-05-2006 को दलमा वन्य प्राणी आश्रायणी, जमशेदपुर में चार राज्यों, झारखंड, बिहार, बंगाल और उड़िसा के आदिवासी समाज के लोग विशु शिकार का आयोजन किया है। इसमें चारो राज्यों के हजारो शिकारी, समूह में दलमा पहाड़ी की चढ़ाई आज से हीं शुरू कर दी है। कल इस वन्य प्राणी आश्रयणी को चारो ओर से घेर कर सामुहिक शिकार किया जायेगा, जिसमें अनेकों प्रजाति के वन्य जंतुओं का जीवन समाप्त होगा। दलमा में इस पुरानी सामाजिक व्यवस्था की बलि-वेदी पर वन्य जंतुओं की आहुति प्रतिवर्ष एक नियत तिथि को देकर विशु पर्व मनाया जाता है।
कैसे किये जाते हैं वन्य जंतूओं के शिकार:
1.
हाका विधिः इस विधि द्वारा सैकड़ो की संख्या में शिकारी एक बड़े वन्य क्षेत्र को चिन्हित कर तीन दिशाओं से मानवरूपी दीवार से घेराबन्दी कर आवाज लगाते हुए आगे बढ़ते हैं जबकि एक ओर खुला रहता है, जिधर; शिकारी हथियार के साथ छिप कर बैठे होते हैं। सामुहिक शोर से वन्य जंतु विचलित होकर शांत इलाके की ओर भागते हैं तथा छिपे शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं।
2. कृतिम दावाग्नि विधिः इसमें शिकारी वन्य जंतु बहुल क्षेत्रों में तीन दिशाओं से आग लगा देते हैं जबकि एक ओर खुला रहता है, खुले भाग में शिकारी हथियार के साथ छिप कर बैठे होते हैं। जैसे हीं वन्य जंतु जान बचाने के फिराक में उस ओर भागते हैं, उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है।
3. जल श्रोतों के पास शिकारः इसमें शिकारी जलश्रोतों के पास छिपकर घात लगा कर बैठे होते हैं और जैसे हीं कोई जंतु पानी पीने आता है उसे मार दिया जाता है।
विशु शिकार रोकने का विभागीय प्रयासः
1.
प्रशासानिक तैयारी के रूप में वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने बड़ी संख्या में वनकमियों की प्रतिनियुक्ति दलमा में की है ताकि आश्रयणी क्षेत्र में त्वारित एवं निरंतर गस्ती होती रहे तथा वन्य जंतुओं को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा दी जा सके। दूसरी ओर वरीय पदाधिकारी वहीं कैम्प किये हुए हैं एवं जिला प्रशासन की मदद से इस विशु शिकार को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं।
2. एक सप्ताह पहले से हीं वन्य प्राणी प्रमंडल, राँची के वन प्रमंडल पदाधिकारी श्री सिद्धार्थ त्रिपाठी दलमा का निरंतर दौरा कर इको विकास समितिओं, आश्रयणी के आस-पास आवासित ग्रामिणों तथा सेंदरा समितियों के साथ बैठक कर रहे हैं ताकि विशु पर्व पर सांकेतिक शिकार हो। एक बैठक इको विकास समिति के सदस्य श्री रामदास सोरेन के साथ हुई, जिन्होने सांकेतिक शिकार के मुद्दे पर कहा कि समाज के अन्य लोगों से बात करनी होगी, उसके बाद इसपर अंतिम निर्णय लिया जायेगा। इस बैठक में सेंदरा समिति के सदस्य भी उपस्थित थे।
सरकार की कोशिश: राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू है, अतः महामहिम राज्यपाल महोदय को हीं जनता से सम्वाद को आगे आना पड़ा एवं उन्होने आम जनता से विशु शिकार से परहेज की अपील जारी की है। अपने अपील में महामहिम ने रूढ़ीवादी व्यवस्था को छोड़ने एवं अपने गोत्रो की सुरक्षा की अपील जारी की है।इतने प्रयासों के बाद भी 4 मई को दलमा में वन्य जंतुओं के जीवन की होली खेली जायेगी, ये निश्चित है, क्योंकि उपरोक्त प्रयास प्रतिवर्ष के हैं एवं कम से कम मैं बीस वर्षो से इस कवायद को देखता आ रहा हूँ। रूढ़ीवादी व्यवस्था, सांस्कृतिक परम्परा एवं पर्व के नाम पर वन्य जंतुओं की हत्या जारी रहेगी। वन्य जंतुओं की हत्या के लिए बने कड़े कानूनी प्रावधान कानून की किताबों में बन्द रहेंगे। आदिवासी समाज की रक्षा एवं संरक्षण देने के नाम पर सरकारें उनको पितृत्व प्यार देती रहेंगी जबकि वन्य जंतुओं की सामुहिक हत्या होती रहेंगी क्योंकि ये पशु वोट (Vote) जो नहीं दे सकते!
इटकी व बेड़ो क्षेत्र में भी विशु शिकार की धमक:
इटकी एवं बेड़ो क्षेत्र के सीमावर्ती जंगलों में परम्परागत रूप से दो दिवसीय विशु शिकार पिछ्ले सप्ताह खेला गया। ढ़ोल-नगाड़ा, रणभेरी, झंडा एवं पारम्परिक हरवे-हथियार से लैस 21 पहड़ा पश्चिमी, 12 पहड़ा बेड़ो, 10 पहड़ा कटरमी, 5 पहड़ा गड़गाँव से सम्बन्धित सैकड़ों लोगों ने जानवरों को खदेड़ कर शिकार किया। शिकार खेलने के बाद लोगों ने नदी पहुँच कर अपने पुरखों के नाम पर सामूहिक रूप से सत्तु उड़ाने की रश्म पुरी की। विशु शिकार में पूर्व विधायक विश्वनाथ भगत, गोविन्द भगत, पहड़ा राजा, दिवान, कोटवार, पइनभारा सहित भारी संख्या में लोग शामिल थे जबकि वन विभाग कुम्भकरणी नींद में सोयी रही और इस मामले पर कोई करवाई नहीं हुई।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

खतरे की घंटीःस्वच्छ पर्यावरण की कल्पना करते हैं तो किसे संरक्षण देना होगा?

गिद्ध को समाज में घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। इसे मुर्दाखोर के रूप में जाना जाता है। ग्रंथो में इसकी दृष्टि एवं ताकत का बखान मिलता है लेकिन क्या आपने कभी सोंचा है कि ये अपरोक्ष रूप से हमें क्या देते हैं? ये इस प्रकृति के अनमोल धरोहर हैं, जैव विविधता के सम्वाहक हैं, वहीं पर्यावरणीय संतुलन बनाने में सहयोगी बन कर एक अहम रोल अदा करते हैं।
इस भू-मंडल पर जीवन मृत्यु का क्रम चलता है। मानव शरीर का मृत्युपर्यन्त संस्कार तो हमलोग कर देते हैं लेकिन क्या आपने कभी इस ओर ध्यान दिया है कि पालतू एवं वन्य जन्तुओं की मृत्यु के उपरांत उनके शरीर का प्रबन्धन कैसे होता है? प्रकृति ने अपनी व्यवस्था सुदृढ़ीकरण के लिए गिद्धों का प्रावधान रखा है जो दुषित लाश को भी अपने उदर में उतार कर अपना जीवन सँवारता है जिससे सिर्फ महामारी एवं संक्रमण होने के खतरे को खत्म करता है बल्कि पर्यावरण में स्वच्छता मंत्रालय का कार्य भी निपटाता है। इनकी उपयोगिता तब समझ में आती है जब जानवरों की मृत्यु विहड़ो एवं दुरुह क्षेत्रों में हो जाती है एवं उनके लाश को नष्ट करना मानव पहुँच से दूर हो जाता है तब ये प्राणी अपनी देखने के विलक्षण प्रतिभा का फायदा उठाकर वहाँ पहुँच कर उससे होने वाली सम्भावित महामारी के खतरे से बचाता है। ये पर्यावरणीय व्यवस्था का बहुत अहम पहलू है कि गिद्ध हीं एक ऐसी प्रजाति है जो सड़े-गले मांस को खा सकता है। वे सड़े हुए, एंथ्रेक्स और हैजा बैक्टीरिया युक्त मांस खा सकते हैं। अतः हमें जीवन के खतरों को कम करना है एवं स्वच्छ पर्यावरण की कल्पना करना है तो गिद्धों को संरक्षण देना होगा। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने गिद्धों की लगातार हो रही कमी को नोटिस किया है एवं सम्भावित खतरों को भाँ कर पूरे भारत में गिद्ध परियोजनाका शुभारम्भ किया है ताकि तेजी से कम हो रहे गिद्ध को संरक्षण एवं सम्बर्ध किया जा सके।
पर्यावरण में गिद्धों की भूमिका:
पर्यावरण के संतुलन में गिद्धों की बड़ी भूमिका है, सदियों से ये गिद्ध ही मरे हुए जानवरों के अवशेषों को खा कर देखा जाए तो धरती पर पडी गन्दगी को ख़त्म करते रहे हैं जिससे बहुत सी बिमारियाँ संक्रमण की रोकथाम होती है। प्राकृतिक रूप से भोजन चक्र में गिद्धों की भूमिका अहम रही है और खाद्य श्रंखला में उनका महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन पिछले एक दशक में गिद्ध प्रजाति लुप्त होने की कगार पर पहुँच गई है।
प्रकृति के इस चक्र में साफ-सफाई का काम करने वाले गिद्दों की संख्या पिछले एक दशकों में एकाएक घट गई है, लगभग सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में विलुप्त हो रहे गिद्धों को बचाने के लिए भारत सरकार ने प्रयास शुरु कर दिए हैं। इसके तहत पशुओं को दी जाने वाली उस दवा पर प्रतिबंध लगा दिया है जिसके कारण गिद्धों की मौत हो रही थी। संरक्षण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से 97% की कमी आई है और वे विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं।
एक चेतावनी: वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगले दस सालों में एशियाई गिद्ध विलुप्त हो सकते हैं
डायक्लोफेनिक [Diclofenac] एक ज़हर, जिससे गुर्दे खराब व काले पड़ने लगे


मवेशियों के बीमार पड़ने पर पशु चिकित्सक अक्सर डाइक्लोफेनेक दवा के उपयोग की सलाह देते आए हैं। इस दवा से मवेशियों का ज्वर दर्द दूर हो जाता है लेकिन इस दवाई को खाने के बाद यदि किसी पशु की मौत हो जाती है तो मरने पर गिद्धों का भोजन बने मवेशी, गिद्धों को भी मौत की नींद सुलाने लगे। भारत, पाकिस्तान और नेपाल में हुए सर्वेक्षणों में मरे हुए गिद्धों के शरीर में डायक्लोफ़ेनाक के अवशेष मिले हैं। उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इस दवा के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचता है, जिससे वे मौत का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से भारत में गिद्धों की संख्या तेजी से कम हो रही है। इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है कि पशुओं को दर्दनाशक के रुप मे एक दवा डायक्लोफ़ेनाक दी जाती है।

पर्यावरण को बचाए रखने में महत्वपूर्ण साबित हो रहे गिद्धों को भी बचाने के लिए पक्षी वैज्ञानिकों ने शोध किया। पता चला कि 1980 से बाजार में बिक रही डाइक्लोफेनेक दवा से मरे मवेशियों की वजह से गिद्धों में बिसरल गौटबीमारी मिली। इस बीमारी से गिद्धों के गुर्दे खराब काले पड़ने लगे थे, जिससे उनकी कुछ दिनों में मौत होने लगी।

रेगिस्तानी इलाकों के मुख्यतया पाए जाने वाले गिद्धों की संख्या सिर्फ गुजरात में ही 2500 से घटकर 1400 रह गई है। कभी राजस्थान मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब बिरले ही कही दिखाई देते हों
प्रजनन:

इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है, गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं। भारत मे कभी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती थी : बियर्डेड, इजिप्शयन, स्बैंडर बिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लोंगबिल्ड, हिमालियन ग्रिफिम एवं व्हाइट बैक्ड। इनमें से चार प्रवासी किस्म की हैं।

पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों एवं शोधकर्ताओं का सर्वेक्षण रिपोर्ट क्या कहते हैं:

  • सफ़ेद पूँछ वाले एशियाई गिद्धों की संख्या 1992 की तुलना में 99.9 प्रतिशत तक कम हो गई है।
  • इसके अनुसार लंबे चोंच वाले और पतले चोंच वाले गिद्धों की संख्या में भी इसी अवधि में 97 प्रतिशत की कमी आई है।
  • ज़ूलॉजिकल सोसायटी ऑफ़ लंदन के एंड्र्यू कनिंघम इस रिपोर्ट के सहलेखक भी हैं. वे कहते हैं, "इन दो प्रजातियों के गिद्ध तो 16 प्रतिशत, प्रतिवर्ष की दर से कम होते जा रहे हैं।"
  • उनका कहना है, "यह तथ्य अपने आपमें डरावना और विचलित करने वाला है कि सफ़ेद पूँछ वाले गिद्ध हर साल 40 से 45 प्रतिशत की दर से कम होते जा रहे हैं।"
  • शोधकर्ताओं ने सलाह दी थी कि जानवरों को डाइक्लोफ़ेनाक नाम की दर्दनाशक दवा को बंद कर देना चाहिए।
  • भारत सरकार ने इसे वर्ष 2006 में प्रतिबंधित भी कर दिया गया था लेकिन भारतीय और ब्रिटिश शोधकर्ताओं का कहना है कि इस प्रतिबंध का कोई ख़ास असर नहीं हुआ है। उनका कहना है कि जानवरों के लिए डाइक्लोफ़ेनाक दवा के निर्माण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन अब लोग मनुष्यों के लिए बन रही दवा का उपयोग जानवरों के लिए कर रहे हैं। उनका कहना है कि दवा का आयात किया जा रहा है और इसका उपयोग हो रहा है।
  • इससे पहले शोधकर्ताओं ने डाइक्लोफ़ेनाक की जगह मेलोक्सिकैम [Meloxicam] नाम की दवा के उपयोग की सलाह दी थी लेकिन चूँकि वह डाइक्लोफ़ेनाक की तुलना में दोगुनी महंगी है इसलिए इसका उपयोग नहीं हो रहा है।
  • विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गिद्धों के विलुप्त होने की रफ़्तार यही रही तो एक दिन ये सफ़ाई सहायक भी नहीं रहेंगे
  • जैसा कि वे बताते हैं 90 के दशक के शुरुआत में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों की संख्या में गिद्ध थे लेकिन अब उनमें से कुछ लाख ही बचे हैं
  • वैज्ञानिकों का कहना है कि गिद्धों को केवल एक प्रजाति की तरह बचाया जाना ज़रुरी है बल्कि यह पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी ज़रुरी है वे चेतावनी देते रहे हैं कि गिद्ध नहीं रहे तो आवारा कुत्तों से लेकर कई जानवरों तक मरने के बाद सड़ते पड़े रहेंगे और उनकी सफ़ाई करने वाला कोई नहीं होगा और इससे संक्रामक रोगों का ख़तरा बढ़ेगा।
    डायक्लोफेनिक दवा एक ज़हर, जो टनों की संख्या में गाँव-शहरो में उपलब्ध है
  • संरक्षण के लिए उठाए गए कदम :
  • पशुओं के इलाज के दौरान उन्हें दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लोफेनिक ही गिद्धों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, यह बात आज से करीब दो दशक पहले ही उजागर हो गई थी। डायक्लोफेनिक से गिद्धों की मौत होने की जानकारी करीब 18 साल पहले ही मिल गई थी, लेकिन तब से लेकर आज तक गिद्धों में दवा के असर को कम करने का कोई तरीका ढूंढ़ा नहीं जा सका है। भारत सरकार भी हाल ही में हुए सर्वेक्षणों की रिपोर्ट आने के बाद मान गई कि इस दवाई के कारण ही गिद्धों की मौत हो रही है नतीजतन भारत सरकार से संबद्ध नेशनल बोर्ड फॉर वाइल्डलाइफ़ ने डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा की थी जिसे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने स्वीकार कर डायक्लोफ़ेनाक की जगह दूसरी दवाइयों के उपयोग को मंज़ूरी दे दी।
ब्रिटेन के रॉयल सोसायटी फॉर प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्ड्स में अंतरराष्ट्रीय शोध विभाग के प्रमुख डेबी पेन का कहना है कि गिद्धों की तीन शिकारी प्रजातियाँ चिंताजनक रुप से कम हुई हैं, उनका कहना है, "हालांकि अब भारत में डायक्लोफ़ेनाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया है लेकिन भोजन चक्र से इसका असर ख़त्म होने में काफ़ी वक़्त लगेगा" गौरतलब है की टनों की संख्या में यह दवा गाँव-शहरो में उपलब्ध है, निरक्षरता और इस सम्बन्ध में कोई समुचित जानकारी नही होने से इस पर लगाए गए प्रतिबन्ध इतनी जल्दी असरदार साबित होंगे इसमें शक लगता है।
संरक्षण कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले 12 सालों में गिद्धों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से 97% की कमी आई है और वे विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं।

संरक्षण के लिए उठाए गए एक प्रायोगिक कदम :

नेपाल में जारी एक प्रयास के अंतर्गत गिद्धों के संरक्षण के लिए एक परियोजना की परिकल्पना सामने आयी है। इस परिकल्पना अंतर्गत एक रेस्तरां खोला गया है जिसका नाम "गिद्ध रेस्तरां" रखा गया है। ये "रेस्तरां" एक खुले घास क्षेत्र जहाँ स्वाभाविक रूप से, बीमार और पुराने गायों के मरने के बाद रख कर गिद्धों को खिलाया जाता है

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

झारखण्ड का हाल : वन्य जीवों की हत्या कर सांस्कृतिक पह्चान बनती है

24 मार्च 2009 को बेड़ो (राँची) के सालो टोली जंगल में 21 पहड़ा पूर्वी (आदिवासी समुदाय) के तत्वाधान में आयोजित वार्षिक बासा शिकार के दौरान बतौर मुख्य अतिथि समाजसेवी सह शिक्षाविद डा0 रवींद्र भगत ने कहा,बासा शिकार हमारी परम्परा और सांस्कृतिक पहचान है

तत्पश्चात मुख्य अतिथि महोदय शिकार करने वाले दल का अगुआई कर शुभारम्भ भी किया। शिकारी दल का नेतृत्व 21 पहड़ा राजा गन्दरू उराँव, डा0 रवींद्र भगत (मुख्य अतिथि) और 21 गाँवों के पाहन, महतो, दीवान, कोटवार ने संयुक्त रूप से हरवे-हथियार से लैस होकर ग्रमीणों के साथ मिलकर मासु, हुलासी, शहेदा, लतरातु, कुल्ली, सौंका, डोला और सगुदा के जंगलों में शिकार खेला। सांस्कृतिक पहचान के रक्षक एवं परम्परा के वाहक तथाकथिक सभ्रांत लोगों ने शिकार की परम्परा को निभाने के लिए वन्यजीवों की हत्या की जबकि दूसरी ओर वन विभाग का भारी-भरकम महकमा इस तरह की घटनाओं को वन्यजीवों को अपने हाल पर छोड़ कर अँधी-बहरी बनी तमाशबीन बनी हुई है। विभाग द्वारा किसी तरह की कोई सार्थक पहल अभी तक नहीं हो रही है कि वन्य जीव आशांवित हों कि अगले दिन उनकी हत्या नहीं होगी।

मेरा पक्ष इस ओर है कि सांस्कृतिक पहचान एवं परम्परा का निर्वहन होना चहिए, इसी में हमारीभारतीय सांस्कृतिक की विश्व-पटल पर अमीट छाप भी है, लेकिन परम्परा के नाम पर रुढ़ीवादीव्यवस्था को ढ़ोना कहाँ तक जायज है, इसकी भी समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए।

बासा शिकार की आदिवासी समुदाय में परम्परा बहुत पुरानी रही होगी, वो भी उस जमाने में जब आदिवासी लोग के पास भौतिक सुख-सुविधाऐं नहीं थी, वे जंगलों में निवास करते होंगे एवं उनके पास जीने के साधन के रूप में एवं भोजन स्वरूप वन्यजीव सुलभ उपलब्ध रहें होंगे। इसी पृष्टभूमि में सांस्कृतिक व्यवस्था का जन्म हुआ होगा कि शिकार सामुहिक रूप से किया जाय जिससे समुदाय का संस्कृति का आदान-प्रदान हो एवं इसी बहाने लोगों में मेल-जोल भी बढ़ जाय, लेकिन ये व्यवस्था उस समय की थी जब वन्य जीवों की बहुतया थी। उसी व्यव्स्था (परम्परा) को आज के परिपेक्ष में ढ़ोना कहाँ तक जायज है ये कहीं से भी एक समाजसेवी एवं शिक्षाविद को शोभा नहीं देती क्योंकि उन्हें भी ये जानकारी होगी कि आज वन्य जीवों की क्या स्थिति है। आज अधिकांश वन्य जीवों की प्रजातियों पर संकट आ गयी हैं एवं विलुप्ति के कगार पर हैं, फिर ये किस तरह की पहचान बनाना चाहते हैं, जब उसके साधनों को उनके बच्चे हीं किताबों के पन्नों पर देखेंगे।

इस तरह की रूढ़ीवादी एवं जैव व्यवस्था से खिलवाड़ करने वाले अबोध लोगों की भर्तस्ना सामाजिक स्तर पर तथा उनके कुकृत्यों को रोकने की पहल भी की जानी चाहिए, ऐसी मेरी राय है।

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